सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान मंगलवार से दो दिन के भारत दौरे पर हैं. वो पाकिस्तान से होते हुए भारत आ रहे हैं.
पाकिस्तान के साथ वो 20 अरब डॉलर के समझौते करके आ रहे हैं. अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकीं हैं कि भारत के साथ किस तरह के समझौते होंगे.
भारत और सऊदी अरब के कई आपसी हित हैं. पाकिस्तान से सऊदी की नज़दीकी, कश्मीर पर सऊदी का रुख़, कट्टरपंथी ताक़तों को उसका समर्थन जैसे मुद्दे क्या भारत और सऊदी अरब की सच्ची दोस्ती के बीच रुकावटें डालने का काम करते हैं?
इन सवाल पर मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं, ''सऊदी अरब और भारत के सिस्टम में फ़र्क़ है. भारत लोकतंत्र और क़ानून के शासन में विश्वास रखता है. वहीं सऊदी अरब में इस्लामिक हुक़ूमत है. वहां एक कट्टरपंथी शासन हैं और वो हुक़ूमत कट्टरपंथी ताक़तों को प्रोत्साहित भी करती है.''
आग़ा कहते हैं, ''बात भारत और तमाम लोकतांत्रिक देशों के लिए समस्या है. इनमें यूरोप के भी कई देश भी शामिल हैं.''
लेकिन वैसे भारत और सऊदी के बीच रिश्ते बहुत अच्छे हैं. व्यापारिक संबंध लगातार बेहतर हो रहे हैं. 25 लाख से भी ज़्यादा भारतीय सऊदी अरब में काम करते हैं.
कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब के स्टैंड को लेकर भी भारत असहज रहता है.
दरअसल, इस्लामिक कॉन्फ्रेंस ऑर्गेनाइज़ेशन में पाकिस्तान के कश्मीर से जुड़े प्रस्ताव का सऊदी अरब और खाड़ी के दूसरे देश हमेशा समर्थन करते हैं. क़मर आग़ा कहते हैं कि ये बहुत बड़ी बात है.
हालांकि सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि 2001 में जब भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह रियाद गए थे तब सऊदी अरब ने कश्मीर मुद्दे पर विस्तृत प्रस्ताव दिया था. इस पर भारत ने कहा था कि वो इस मुद्दे पर सऊदी की स्थिति से संतुष्ट है.
इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को लेकर भी भारत और सऊदी अरब के बीच मतभेद है.
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान के अलावा ऐसे अकेले दो देश थे, जिन्होंने तालिबान को सत्ता में आने पर मान्यता दी थी और उसकी मदद भी की थी.
अभी उनके संबंध तालिबान से बने हुए हैं. भारत तालिबान को एक चरमपंथी संगठन मानता है और अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को समर्थन करता है.
क़मर आग़ा कहते हैं कि सऊदी अरब कट्टरपंथी ताक़तों का समर्थन करता है. वो मदरसों को या रूढ़िवादी विचारधारा का प्रोत्साहित करता है.
वो कहते हैं, "भारत के अंदर बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान हैं. देश की आबादी के क़रीब 14 फ़ीसदी मुसलमान हैं. डर रहता है कि कहीं भारत में भी इस्लामिक चरमपंथ ना बढ़े. पाकिस्तान की तरह अगर उन मदरसों को बड़ी फंडिंग मिलती है तो ये भारत के लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है."
हालांकि पूर्व राजदूत तलमीज़ अहमद कहते हैं कि मौजूदा वक़्त में भारत और सऊदी अरब दोनों देश चरमपंथ के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं.
वो कहते हैं कि साल 2008 में हुए मुंबई हमले पर सऊदी अरब समेत खाड़ी के दूसरे देशों ने प्रतिक्रिया दी थी और माना था कि पाकिस्तान की धरती से चलाए जा रहे और पाकिस्तान प्रायोजित जिहादी समूहों से पूरे क्षेत्र को ख़तरा है."
तलमीज़ अहमद का कहना है कि मौजूदा वक़्त में भारत और सऊदी अरब के बीच रिश्ते काउंटर टेररिज़्म पर आधारित हैं और ये रिश्ता बेहद मज़बूत है. वो मानते हैं कि दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर मिलकर काम कर सकते हैं क्योंकि इसमें दोनों के आपसी हित हैं."
वो कहते हैं कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और 2016 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सऊदी दौरे से दोनों देशों के बीच के रिश्ते सामरिक भागीदारी के अलग ही स्तर पर पहुंचे हैं.
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