हैदराबाद के एक मुशायरे में जब कैफ़ी आज़मी अपनी एक नज़्म सुना रहे थे तो उसे सुनाने के उनके अंदाज़ ने एक हसीना को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था.
उस हसीना ने उस रोज़ सफ़ेद हैंडलूम का कुर्ता, सफ़ेद सलवार और इंद्रधनुषी रंग का दुपट्टा पहन रखा था. लंबे क़द के दुबले पतले, पुरकशिश नौजवान अतहर अली रिज़वी उर्फ़ कैफ़ी आज़मी ने उस दिन अपनी घनगरज आवाज़ में जो नज़्म सुनवाई थी, उसका शीर्षक था 'ताज'.
बाद में वो हसीना शौकत उनकी पत्नी बनी. शौकत आज़मी ने उस मुशायरे को याद करते हुए बीबीसी को बताया, "मुशायरा ख़त्म हुआ तो लोगों की भीड़ कैफ़ी, अली सरदार जाफ़री और मजरूह सुल्तानपुरी की तरफ़ ऑटोग्राफ़ बुक ले कर लपकी."
उन्होंने कहा, 'कैफ़ी पर कॉलेज की लड़कियाँ मधुमक्खियों की तरह झुकी जा रही थीं. मैंने कैफ़ी पर उड़ती हुई नज़र डाली और सरदार जाफ़री की तरफ़ मुड़ गई. जब भीड़भाड़ कम हो गई तो मैंने बहुत अदा से अपनी ऑटोग्राफ़ बुक कैफ़ी की तरफ़ बढ़ा दी. उन्होंने उस पर बहुत ही मामूली सा शेर लिख दिया. बाद में जब मुझे मौक़ा मिला तो मैंने उनसे पूछा कि आपने इतना ख़राब शेर मेरी किताब पर क्यों लिखा?"
इस नज़्म को सुनने के बाद ही शौकत ने अपने वालिद से कहा कि वो अगर शादी करेंगी तो सिर्फ़ कैफ़ी से ही. तब तक उनकी मंगनी उनके मामूज़ाद भाई उस्मान से हो चुकी थी. जब उस लड़के को ये पता चला तो उसने उनके अब्बू के रिवॉल्वर से ख़ुदकुशी करने की कोशिश की.
शौक़त कैफ़ी बताती हैं कि "मेरे पिता बहुत समझदार और तरक़्क़ी पसंद आदमी थे. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तुम्हे बंबई ले कर जाउंगा. वहाँ तुम देखना कि कैफ़ी किस तरह की ज़िंदगी जी रहे हैं. तब तुम आख़िरी फ़ैसला करना. वहाँ कैफ़ी से मिलने के बाद अब्बाजान मुझे चौपाटी पर घुमाने के लिए ले गये. वहाँ पर उन्होंने मेरी राय पूछी. मैंने उनकी आँखों में देख कर कहा कि अगर कैफ़ी मिट्टी भी उठाएंगे और मज़दूरी भी कर रहे होंगे, तो भी मैं उनके साथ मज़दूरी करूंगी और शादी उन्हीं से करूंगी."
अगले ही दिन उन दोनों का निकाह हो गया. उस निकाह में जोश मलीहाबादी, मजाज़, साहिर, सिकंदर अली वज्द से ले कर बंबई रेडियो स्टेशन के स्टेशन डायरेक्टर ज़ुल्फ़िकार बुख़ारी और कृश्न चंदर भी शामिल हुए.
कैफ़ी और शौक़त की बेटी शबाना आज़मी अभी भी वो दिन भूली नहीं हैं जब वो अपने वालिद के साथ मुशाएरों में जाया करती थीं.
शबाना बताती हैं, "दरअसल मेरी माँ थियेटर में काम करती थीं और उन्हें अक्सर दूसरे शहरों में जाना पड़ता था. तब अब्बा ही हमारी देखभाल करते थे. घर में पैसे तो बिल्कुल नहीं थे, इसलिए हम लोग मेड रखना अफ़ोर्ड नहीं कर सकते थे. अब्बा हम दोनों को अपने साथ मुशायरों में ले कर जाते थे. मुझे अच्छी तरह याद हैं कि हमें स्टेज पर ही गाव तकियों (मसनद) के पीछे सुला दिया जाता था."
वो कहती हैं, "जब देर रात ज़ोर से तालियों की आवाज़ गूंजती थी, तो हमें पता चल जाता था कि अब्बा का नाम अनाउंस किया जा रहा है. हम जाग कर उनका कलाम सुना करते थे. वो हमेशा मुशायरे के आख़िर में ही पढ़ते थे."
शायरी किताबों में पढ़ी तो जाती ही है, लेकिन सुनी भी जाती है. लिखने की तरह इसकी अदायगी भी एक कला है और कहना न होगा कि कैफ़ी इस कला के माहिर थे.
मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने एक बार बीबीसी को बताया था, "उस ज़माने में हिंदी में सबसे प्रभावशाली कविता-पाठ शिवमंगल सिंह सुमन का हुआ करता था. उनमें श्रोताओं को बांध लेने की गज़ब की क्षमता थी. लेकिन उर्दू में उनकी टक्कर का सिर्फ़ एक ही शायर था और उसका नाम था कैफ़ी आज़मी."
उन्होंने कहा, "कैफ़ी जब स्टेज पर आते थे तो उनकी आवाज़, उनके हावभाव और उनकी प्रस्तुति अच्छी होती थी कि उनके सामने ऊँची से ऊँची आवाज़ में शेर सुनाने वाले पानी मांगते थे."
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