रूस में बीस साल की अपनी सत्ता के दौरान व्लादिमीर पुतिन ने अपनी ताक़त का कुछ ऐसा ताना-बाना बुना है कि देश की सत्ता सिर्फ़ उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है.
इसका एक बड़ा उदाहरण उनके उस प्रस्ताव के रूप में भी देखा जा सकता है जिसके बाद रूस के प्रधानमंत्री दिमित्रि मेदवेदेव और उनकी पूरी कैबिनेट ने इस्तीफ़ा दे दिया.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने देश में व्यापक संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव रखा है.
इन प्रस्तावित सुधारों के लागू होने के बाद सिर्फ़ संविधान के सभी अनुच्छेद ही नहीं बदलेंगे बल्कि सत्ता संतुलन और ताक़त में भी बदलाव आएगा.
राष्ट्रपति पुतिन ने जो संवैधानिक प्रस्ताव रखे हैं, उस पर जनमत-संग्रह कराया जाएगा. इसके ज़रिए सत्ता की ताक़त राष्ट्रपति के बजाय संसद के पास ज़्यादा होगी. लेकिन यही वो बात है जिसके आधार पर कयास लगाए जा रहे हैं कि संवैधानिक बदलाव के प्रस्ताव के पीछे पुतिन की सोची-समझी रणनीति है.
जानकार मानते हैं कि वो आगे भी सत्ता के केंद्र में बने रहना चाहते हैं जबकि बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल साल 2024 में समाप्त हो रहा है. जिसके बाद वो राष्ट्रपति नहीं रहेंगे.
इस बीच एक बड़ा बदलाव ये भी हुआ है कि रूस के राष्ट्रपति ने दिमित्रि मेदवेदेव को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का डिप्टी चेयरमैन बनाने का फ़ैसला किया गया है. लेकिन इन सबके पीछे पुतिन की रणनीति क्या है?
रूस मामलों के विशेषज्ञ और जेएनयू में प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं. "राष्ट्रपति पुतिन के इन फ़ैसलों को दो आधार पर देखा जा सकता है. पहला तो बेशक ये कि वो सत्ता को बचाए रखना चाहते हैं. फिलहाल रूस में सुपर प्रेसीडेंशियल सिस्टम है. जहां पर राष्ट्रपति ही सबकुछ है. वो सबसे अधिक ताक़तवर है.''
प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं, ''किसी भी अन्य देश के मुक़ाबले में रूस का राष्ट्रपति पद अधिक ताक़तवर है. रूस का राष्ट्रपति ड्यूमा (सदन) को बर्ख़ास्त भी कर सकता है. रही बात उस प्रस्ताव की जिसके तहत बदलाव किये जा सकते हैं तो इसके तहत वो सारी शक्तियां जो अभी तक राष्ट्रपति के पास थीं वो अब कम की जा रही हैं और ड्यूमा को ताक़तवर बनाया जा रहा है.''
प्रोफ़ेसर राजन कुमार का मानना है, ''प्रधानमंत्री और डिप्टी प्रधानमंत्री की शक्तियां बढ़ाई जा रही हैं. चूंकि साल 2024 तक पुतिन का कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा तो बहुत हद तक इस बात की संभावना है कि वो एक बार फिर प्रधानमंत्री बन जाएंगे. ऐसे में संभव है कि इसीलिए प्रधानमंत्री की शक्तियां बढाई जा रही हैं ताकि अपना कार्यकाल ख़त्म होने पर वो प्रधानमंत्री के पद पर काबिज़ हो सकें."
अगर बात इस फ़ैसले से जुड़ी दूसरी संभावना की करें तो ऐसा हो सकता है कि पुतिन साल 2024 में कार्यकाल समाप्त होने के बाद ही राजनीति से किनारा कर लें, लेकिन तब उनके लिए मुश्किल हो सकती है.
प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं, "ऐसा हो सकता है कि शेष चार साल का समय गुज़ारने के बाद वो राजनीति से संन्यास ले लें या सक्रिय राजनीति छोड़ दें. लेकिन अगर वो ऐसा करते हैं तो हो सकता है कि उस वक़्त जो भी सत्ता में हो, उनके लिए मुश्किलें पैदा कर दे. सिस्टम में कोई ऐसा ना आ जाए जो उन्हें दंडित करने के बारे में सोचे. ऐसे में पुतिन की यह रणनीति हो सकती है कि वो कोई ऐसा उत्तराधिकारी तैयार करें जिसके रहते वो निश्चिंत रह सकें. ऐसे में जो संशोधन या बदलाव सामने आ रहे हैं, उसमें इस बात की पूरी संभावना नज़र आती है."
रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर कई राजनीति हत्याओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में पुतिन अपने लिए किसी ऐसे उत्तराधिकारी को चाहेंगे जिसके होने से उन्हें दिक्कत ना हो.
जेएनयू में रशियन इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह कहते हैं, "रूस में साल 2021 में संसदीय चुनाव होने वाले हैं और साल 2024 में पुतिन का कार्यकाल ख़त्म होने वाला है. इसके बाद पुतिन शायद प्रधानमंत्री पद पर नहीं आना चाहेंगे. ऐसे में वो एक ऐसी व्यवस्था अभी से सुनिश्चित करना चाहते हैं जिसमें चेक एंड बैलेंस हो और संसद को ज़्यादा ताक़त हो. इसके अलावा एक नए स्टेट काउंसिल को भी संवैधानिक अधिकार देने की बात की जा रही है. माना ये जा रहा है कि अगर पुतिन प्रधानमंत्री नहीं बनते हैं तो वो स्टेट काउंसिल के अध्यक्ष बन सकते हैं और वहीं से वो अपनी ताकत दिखाएंगे."
क्या रूस में पुतिन को चुनौती देने वाला कोई नहीं है. इस सवाल पर प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और रूस को चीन नहीं समझा जाना चाहिए.
वो कहते हैं, "रूस में कई पार्टियां हैं. पुतिन के समर्थन वाली यूनाइटेड रशियन पार्टी के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी एक प्रमुख पार्टी है. अगर उनका वोट बैंक या समर्थन देखें तो उनके पास भी 12-13 प्रतिशत का वोट बैंक है. इसके अलावा भी कई पार्टियां हैं. लेकिन फिलहाल वहां की राजनीति में यूनाइटेड रशियन पार्टी की स्थिति वही है जो भारत में इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस की थी."
प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, "आसान शब्दों में कहें तो माना जा सकता है कि रूस में फिलहाल वन पार्टी सिस्टम है. कम्युनिस्ट पार्टी अहम है, लेकिन वो ज़्यादातर मसलों पर पुतिन का समर्थन ही करती है. इसके अलावा एक बड़ी वजह ये भी है कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता काफी उम्रदराज़ हैं और ऐसे में वो रूस के युवाओं के बीच उतने लोकप्रिय नहीं हैं."
प्रोफेसर राजन कुमार मानते हैं कि रूस का एक बड़ा मुद्दा सुरक्षा है. यूक्रेन के मुद्दे को लेकर अमरीका के साथ गतिरोध और इसके अलावा कई मुद्दे हैं. ऐसे में वहां के लोग चाहते हैं कि उनका नेता कोई ऐसा हो जो पश्चिमी देशों के हाथों की कठपुतली ना हो. एक वक़्त ऐसा भी था जब रूस के लिए कहा जाता था कि यह एक 'बड़ा पेट्रोल पंप' है और कुछ नहीं. पुतिन ने रूस की स्थिति को मज़बूत बनाया है, ऐसे में उनकी लोकप्रियता से इनक़ार नहीं किया जा सकता.
अमिताभ सिंह भी यही मत रखते हैं. उनका कहना है, "रूस में राष्ट्रपति ही सर्वेसर्वा है. रूस के राष्ट्रपति को जितनी पावर है वो दुनिया में किसी भी दूसरे राष्ट्रपति को नहीं है. उन पर कोई उंगली उठाने वाला नहीं है. वहां जो विपक्ष है, वो भी 'इंस्टीट्यूशनल अपोज़िशन' है. वो कभी भी खुलकर पुतिन का विरोध नहीं करता है और जो लोग विरोध करने की स्थिति में होते हैं, उनके लिए सरकार वो जगह ही नहीं बनने देती. उनकी शक्ति को चुनौती देने वाला कोई नहीं है."
जानकार मानते हैं कि भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय संबंध बेहद मज़बूत हैं. अमिताभ सिंह कहते हैं कि सामरिक दृष्टि से देखें तो भारत और रूस एक दूसरे पर निर्भर हैं. भारत, रूस से हथियार ख़रीदता है.
बीस साल पहले व्लादिमीर पुतिन को सत्ता की चाबी थाली में सजाकर पेश की गई थी.
पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और उनके निकटतम सहयोगियों ने देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने के लिए रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी के पूर्व अधिकारियों को ख़ुद चुना था. उन्हीं में से एक थे व्लादिमीर पुतिन.
व्लादिमीर पुतिन के रूस के राष्ट्रपति बनने में बेहद अहम भूमिका निभाई थी वेलेन्टिन युमाशेव ने. युमाशेव पूर्व पत्रकार हैं और बाद में वो रूसी सरकार में अधिकारी बने. युमाशेव, बोरिस येल्तसिन के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक थे.
येल्तसिन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उस वक़्त कहीं से भी ये विचार नहीं आया था कि ये व्यक्ति आगे चल कर देश का राष्ट्रपति बन सकता है.
Tuesday, January 21, 2020
Monday, January 13, 2020
सीएए-एनआरसी: मुसलमान धार्मिक पहचान को लेकर दुविधा में?
इसकी शुरुआत शशि थरूर के साथ हुई जब उन्होंने एक ट्वीट करके कहा कि "हमारी लड़ाई हिंदुत्व की अतिवादी शक्तियों से है, इस लड़ाई में हम इस्लाम की अतिवादी शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे सकते."
शशि थरूर ने यह बात जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कथित तौर पर लगे 'ला इलाहा इल लल्लाह' के नारे के बारे में कही थी. उनका कहना था कि धार्मिक अतिवाद चाहे हिंदुओं का हो, या मुसलमानों का, उसका विरोध होना चाहिए.
उनकी इस बात पर अच्छी-ख़ासी प्रतिक्रिया हुई, सोशल मीडिया पर थरूर के समर्थन और विरोध दोनों में लोगों ने विचार व्यक्त किए.
यह बहस काफ़ी आगे बढ़ी जिसमें हिंदुओं और मुसलमान, दोनों प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.
रविवार की शाम को जामिया मिल्लिया के प्रदर्शनकारियों के बीच जब शशि थरूर पहुँचे तो वहां उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ लेकिन कई लोगों ने उनका विरोध भी किया, ये विरोध उनकी पिछली टिप्पणी को लेकर था.
सोमवार सुबह शशि थरूर ने अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मंशा के साथ एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक पहचान की राजनीति देश को तबाह कर देगी. उनका कहना है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता का जवाब इस्लामी सांप्रदायिकता नहीं हो सकती, यह सिर्फ़ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है बल्कि भारत की आत्मा को बचाने का संघर्ष है.
तीन जनवरी को इरीना अकबर ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक ही था--'वाइ आइ प्रोटेस्ट एज़ ए मुस्लिम' यानी मैं मुसलमान के तौर पर विरोध प्रदर्शन क्यों कर रही हूँ.
इस लेख में उन्होंने शशि थरूर से असहमत होते हुए लिखा, "अगर मुसलमान अपने धार्मिक नारों के साथ अपनी धार्मिक पहचान पर ज़ोर दे रहे हैं तो इसकी वजह यही है कि वे मुसलमान होने की वजह से ही निशाने पर हैं. अगर सरकार मुसलमान होने की वजह से मुझे धमकाना चाहती है तो मैं सार्वजनिक तौर पर अपनी पहचान पर ज़ोर दूँगी."
उन्होंने यहूदी राजनीतिक विचारक हाना एरेंड्ट का हवाला दिया है, हाना को जान बचाने के लिए नाज़ी जर्मनी से भागना पड़ा था, हाना ने कहा था--"अगर किसी पर यहूदी होने की वजह से हमला होता है तो उसे अपना बचाव भी यहूदी की ही तरह करना होगा न कि जर्मन की तरह या सामान्य इंसान की तरह."
इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस में सोमवार को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा हयात फ़ातिमा का लेख छपा है जिसका शीर्षक है - नॉट जस्ट एज़ मुस्लिम यानी सिर्फ़ मुसलमान की तरह नहीं.
उनका कहना है कि ला इलाहा इल लल्लाह जैसे नारों से सीएए विरोधी प्रदर्शनों का दायरा सिमट जाता है.
उनकी दलील है कि "ला इलाहा इल लल्लाह और अल्लाह ओ अकबर जैसे नारे लगने चाहिए जब कि हमला धर्म पर हो रहा हो, यहाँ हमला नागरिकता पर हो रहा है. ऐसे नारों के लिए यह सही समय नहीं है".
हयात फ़ातिमा आगे लिखती हैं कि सीएए के विरोध में कहीं केवल मुसलमानों के प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं. उनका कहना है, "मैं पसंद नहीं करूँगी कि जय श्रीराम, जीसस सन ऑफ़ गॉड के नारे लगाए जाएं, भले ही मैं मुद्दे पर पूरी तरह उनके साथ हूँ, उसी तरह हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उन्हें ला इलाहा इल लल्लाह का नारा पसंद आएगा, भले ही वे सीएए के ख़िलाफ़ हों."
शशि थरूर विवाद को शांत कराने की कोशिश में यही कह रहे हैं कि यह बहस ग़ैर-ज़रूरी है, लेकिन ऐसा लगता है कि धार्मिक पहचान बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है.
इसकी शुरुआत शशि थरूर के साथ हुई जब उन्होंने एक ट्वीट करके कहा कि "हमारी लड़ाई हिंदुत्व की अतिवादी शक्तियों से है, इस लड़ाई में हम इस्लाम की अतिवादी शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे सकते."
शशि थरूर ने यह बात जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कथित तौर पर लगे 'ला इलाहा इल लल्लाह' के नारे के बारे में कही थी. उनका कहना था कि धार्मिक अतिवाद चाहे हिंदुओं का हो, या मुसलमानों का, उसका विरोध होना चाहिए.
उनकी इस बात पर अच्छी-ख़ासी प्रतिक्रिया हुई, सोशल मीडिया पर थरूर के समर्थन और विरोध दोनों में लोगों ने विचार व्यक्त किए.
यह बहस काफ़ी आगे बढ़ी जिसमें हिंदुओं और मुसलमान, दोनों प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.
रविवार की शाम को जामिया मिल्लिया के प्रदर्शनकारियों के बीच जब शशि थरूर पहुँचे तो वहां उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ लेकिन कई लोगों ने उनका विरोध भी किया, ये विरोध उनकी पिछली टिप्पणी को लेकर था.
सोमवार सुबह शशि थरूर ने अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मंशा के साथ एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक पहचान की राजनीति देश को तबाह कर देगी. उनका कहना है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता का जवाब इस्लामी सांप्रदायिकता नहीं हो सकती, यह सिर्फ़ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है बल्कि भारत की आत्मा को बचाने का संघर्ष है.
शशि थरूर ने यह बात जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कथित तौर पर लगे 'ला इलाहा इल लल्लाह' के नारे के बारे में कही थी. उनका कहना था कि धार्मिक अतिवाद चाहे हिंदुओं का हो, या मुसलमानों का, उसका विरोध होना चाहिए.
उनकी इस बात पर अच्छी-ख़ासी प्रतिक्रिया हुई, सोशल मीडिया पर थरूर के समर्थन और विरोध दोनों में लोगों ने विचार व्यक्त किए.
यह बहस काफ़ी आगे बढ़ी जिसमें हिंदुओं और मुसलमान, दोनों प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.
रविवार की शाम को जामिया मिल्लिया के प्रदर्शनकारियों के बीच जब शशि थरूर पहुँचे तो वहां उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ लेकिन कई लोगों ने उनका विरोध भी किया, ये विरोध उनकी पिछली टिप्पणी को लेकर था.
सोमवार सुबह शशि थरूर ने अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मंशा के साथ एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक पहचान की राजनीति देश को तबाह कर देगी. उनका कहना है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता का जवाब इस्लामी सांप्रदायिकता नहीं हो सकती, यह सिर्फ़ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है बल्कि भारत की आत्मा को बचाने का संघर्ष है.
तीन जनवरी को इरीना अकबर ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक ही था--'वाइ आइ प्रोटेस्ट एज़ ए मुस्लिम' यानी मैं मुसलमान के तौर पर विरोध प्रदर्शन क्यों कर रही हूँ.
इस लेख में उन्होंने शशि थरूर से असहमत होते हुए लिखा, "अगर मुसलमान अपने धार्मिक नारों के साथ अपनी धार्मिक पहचान पर ज़ोर दे रहे हैं तो इसकी वजह यही है कि वे मुसलमान होने की वजह से ही निशाने पर हैं. अगर सरकार मुसलमान होने की वजह से मुझे धमकाना चाहती है तो मैं सार्वजनिक तौर पर अपनी पहचान पर ज़ोर दूँगी."
उन्होंने यहूदी राजनीतिक विचारक हाना एरेंड्ट का हवाला दिया है, हाना को जान बचाने के लिए नाज़ी जर्मनी से भागना पड़ा था, हाना ने कहा था--"अगर किसी पर यहूदी होने की वजह से हमला होता है तो उसे अपना बचाव भी यहूदी की ही तरह करना होगा न कि जर्मन की तरह या सामान्य इंसान की तरह."
इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस में सोमवार को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा हयात फ़ातिमा का लेख छपा है जिसका शीर्षक है - नॉट जस्ट एज़ मुस्लिम यानी सिर्फ़ मुसलमान की तरह नहीं.
उनका कहना है कि ला इलाहा इल लल्लाह जैसे नारों से सीएए विरोधी प्रदर्शनों का दायरा सिमट जाता है.
उनकी दलील है कि "ला इलाहा इल लल्लाह और अल्लाह ओ अकबर जैसे नारे लगने चाहिए जब कि हमला धर्म पर हो रहा हो, यहाँ हमला नागरिकता पर हो रहा है. ऐसे नारों के लिए यह सही समय नहीं है".
हयात फ़ातिमा आगे लिखती हैं कि सीएए के विरोध में कहीं केवल मुसलमानों के प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं. उनका कहना है, "मैं पसंद नहीं करूँगी कि जय श्रीराम, जीसस सन ऑफ़ गॉड के नारे लगाए जाएं, भले ही मैं मुद्दे पर पूरी तरह उनके साथ हूँ, उसी तरह हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उन्हें ला इलाहा इल लल्लाह का नारा पसंद आएगा, भले ही वे सीएए के ख़िलाफ़ हों."
शशि थरूर विवाद को शांत कराने की कोशिश में यही कह रहे हैं कि यह बहस ग़ैर-ज़रूरी है, लेकिन ऐसा लगता है कि धार्मिक पहचान बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है.
इसकी शुरुआत शशि थरूर के साथ हुई जब उन्होंने एक ट्वीट करके कहा कि "हमारी लड़ाई हिंदुत्व की अतिवादी शक्तियों से है, इस लड़ाई में हम इस्लाम की अतिवादी शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे सकते."
शशि थरूर ने यह बात जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कथित तौर पर लगे 'ला इलाहा इल लल्लाह' के नारे के बारे में कही थी. उनका कहना था कि धार्मिक अतिवाद चाहे हिंदुओं का हो, या मुसलमानों का, उसका विरोध होना चाहिए.
उनकी इस बात पर अच्छी-ख़ासी प्रतिक्रिया हुई, सोशल मीडिया पर थरूर के समर्थन और विरोध दोनों में लोगों ने विचार व्यक्त किए.
यह बहस काफ़ी आगे बढ़ी जिसमें हिंदुओं और मुसलमान, दोनों प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.
रविवार की शाम को जामिया मिल्लिया के प्रदर्शनकारियों के बीच जब शशि थरूर पहुँचे तो वहां उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ लेकिन कई लोगों ने उनका विरोध भी किया, ये विरोध उनकी पिछली टिप्पणी को लेकर था.
सोमवार सुबह शशि थरूर ने अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की मंशा के साथ एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक पहचान की राजनीति देश को तबाह कर देगी. उनका कहना है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता का जवाब इस्लामी सांप्रदायिकता नहीं हो सकती, यह सिर्फ़ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है बल्कि भारत की आत्मा को बचाने का संघर्ष है.
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