Monday, December 9, 2019

पानीपत की तीसरी लड़ाईः हरियाणा के रोहतक में यूं 'ज़िंदा' हैं मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ

इतिहास कहता है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठाओं के सेनापति सदाशिव राव भाऊ अपनी जान गँवा बैठे थे.

मगर हरियाणा के रोहतक ज़िले के सांघी गांव के लोगों की मानें तो ये बहादुर सेनापति लड़ाई के बाद जीवित थे और उसी गांव में रह रहे थे.

सांघी गांव में मराठाओं के सेनापति सदाशिवराव भाऊ की एक समाधि भी है.

पानीपत की इस लड़ाई से जुड़ी लोकोक्तियों को हम सालों से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं. इनमें से एक है- दो मोती गिरे, दस-बीस अशरफ़ी गंवाई, पैसे का तो कोई हिसाब ही नहीं...

इन्हीं दो मोतियों में से एक का नाम सदाशिव राव है जो इस युद्ध के दौरान मारे गए थे. मगर हरियाणा के सांघी गांव के लोग कुछ अलग ही इतिहास बताते हैं.

'भाऊ राव की गद्दी'

पानीपत से कुछ ही दूरी पर है रोहतक ज़िले का सांघी गांव. यहां के लोगों का मानना है कि सदाशिव राव युद्ध के बाद आकर इस गांव में बस गए थे और यहीं पर उन्होंने समाधि ले ली.

रोहतक शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर बसे सांघी गांव में सदाशिव राव भाऊ के नाम से एक आश्रम भी है. इस आश्रम का नाम है 'डेरा लाधीवाला.' इसी डेरे में सदाशिव राव भाऊ या भाऊ राव की 'गद्दी' है.

सांघी गांव के लोगों के मुताबिक़ 1761 में जब मराठा सेना की हार निश्चित मानी जा रही थी, उसी दौरान सदाशिव राव जख़्मी हो गए थे. ज़ख़्मी अवस्था में वे अपने घोड़े पर सवार होकर युद्धभूमि से बाहर निकल गए.

घायल और आधी बेहोशी की हालत में वे उग्राखेड़ी गांव पहुंचे. उसके बाद वे सोनीपत ज़िले के मोई हुड्डा गांव में चले गए.

अगले पड़ाव में रूखी गांव में उन्होंने शरण मांगी. तब रूखी गांववालों ने उन्हें सांघी गांव जाने का सुझाव दिया.

किंवदंती के मुताबिक़, इसका कारण था सांघी गांव की भौगोलिक स्थिति. ये गांव बड़े-बड़े पेड़ों के कारण हरा-भरा था और आसपास घने जंगल होने के कारण यहां छिपकर रहना आसान था. आख़िरकार युद्ध के आठ दिनों बाद 22 जनवरी, 1761 को वो सांघी गांव पहुंचे और यहां के गांववालों ने उन्हें पनाह दे दी.

गांव से बिलकुल सटकर है- 'डेरा लाधीवाला' आश्रम. सांघी गांव भी मुख्य रास्ते से बहुत अंदर की तरफ़ है. घने हरे-भरे पेड़ों के बीच से होते हुए एक रास्ता गांव तक पहुंचता है. गांव में कोई भी व्यक्ति आपको इस आश्रम तक पहुंचा देगा.

गांव से होते हुए एक रास्ता और अंदर की तरफ़ मुड़ जाता है. इसी रास्ते पर खलिहानों से गुज़रते हुए एक कच्ची सड़क आश्रम तक पहुंचती है.

20 एकड़ ज़मीन पर फैला हुआ ये आश्रम उपजाऊ ज़मीन और कई फलदार पेड़ों से घिरा हुआ है. लोगों का मानना है कि इस आश्रम की स्थापना भाऊ राव ने की थी. सांघी गांव के लोगों की मानें तो ये गद्दी सदाशिव राव ने ही स्थापित की थी.

इतिहासकार एसजी सरदेसाई की किताब 'सलेक्शंस फ़्रॉम द पेशवा दफ्तर' के मुताबिक़, "24 फ़रवरी, 1761 को काशीराजजी ने नानासाहेब को चिट्ठी लिखकर विश्वासराव और सदाशिव राव के पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार की बात लिखी."

नानासाहेब को जब ये खत मिला तब वो झांसी के पास पीछोड़ी गांव में पहुंचे थे और इसका ज़िक्र भी इस किताब में है.

पानीपत की आख़िरी लड़ाई का विवरण देते हुए इतिहासकार जॉर्ज रॉविल्सन ने लिखा है, "युद्ध के अंतिम चरण में सदाशिव राव पेशवा अरबी घोड़े पर सवार होकर गिने-चुने सैनिकों के साथ आख़िरी दम तक लड़ते रहे और शहीद हो गए."

इतिहास के जानकार कुछ भी कहें मगर सांघी गांव के लोगों की धारणा तो यही है कि सदाशिव राव भाऊ यहां बसर कर चले गए.